शायरी – ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’

‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ बघून थियेटर मधून बाहेर पडलात, तर जी गोष्ट सर्वात ताकदीने आठवते ती आहे, त्यातली जावेद अख्तरने लिहिलेली शायरी. जी फरहान च्या तोंडून ऐकतांना एक वेगळीच नशा चढवते. तसा हा चित्रपट ‘दिल चाहता हैं’ आणि ‘रॉक ऑन’ चं प्रौढ वर्झन वाटतो जो फारच सॉलिड स्वरुपात मांडला आहे. चित्रपटात बरेच गूझ-बम्प्स देणारे क्षण आहेत. त्यातल्या पात्रांच एकमेकांमधल्या नात्याशी कुठेना कुठे प्रत्येक व्यक्ती साधर्म्य साधू शकते. पण चित्रपटातला सर्वात बलवान मुद्दा आहे, त्यातली शायरी. चित्रपट बघतांना ती खरंच थेट काळजाच्या आर-पार जाते. मागल्या आठवड्यात हा चित्रपट बघितल्या पासून माझ्या डोक्यात तीच शायरी फिरत होती. ती लवकरच रिलीज होणार असं वाचण्यात आहेत. तोवर तुमच्या साठी खाली लिहितो आहे ….

“इक बात होंटों तक है जो आई नहीं
बस आँखों से हैं झांकती
तुमसे कभी, मुझसे कभी
कुछ लफ्ज़ हैं वोह मांगती
जिनको पहनके होंटों तक आ जाए वोह
…आवाज़ की बाहों में बाहें डालके इठलाये वोह
लेकिन जो यह इक बात हैं
अहसास ही अहसास हैं

खुशबू हैं जैसे हवा में तैरती
खुशबू जो बे-आवाज़ हैं
जिसका पता तुमको भी हैं
जिसकी खबर मुझको भी है
दुनिया से भी छुपता नहीं
यह जाने कैसा राज़ है”

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“जब जब दर्द का बादल छाया
जब ग़म का साया लहराया
जब आंसू पलकों तक आया
जब यह तनहा दिल घबराया

हमने दिल को यह समझाया
…दिल आखिर तू क्यूँ रोता है
दुनिया में यूँही होता है

यह जो गहरे सन्नाटे हैं
वक़्त ने सबको ही बांटे हैं
थोडा ग़म हैं सबका किस्सा
थोड़ी धुप हैं सबका हिस्सा
आँख तेरी बेकार ही नाम हैं
हर पल एक नया मौसम हैं
क्यूँ तू ऐसे पल खोता हैं
दिल आखिर तू क्यूँ रोता हैं”

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“पिघले नीलम सा बहता हुआ यह समाँ
नीली नीली सी ख़ामोशियाँ
ना कहीं हैं ज़मीन
ना कहीं आसमान
सरसराती हुयी टहनियां, पत्तियाँ
कह रही हैं की बस एक तुम हों यहाँ
सिर्फ मैं हूँ मेरी सांसें हैं और मेरी धडकनें
ऐसी गहराइयाँ
ऐसी तनहाइयाँ
और मैं सिर्फ मैं
अपने होने पे मुझको यकीन आ गया”

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“दिलों में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो.
तोह जिंदा हो तुम!
नज़र में ख़्वाबों की बिजलियाँ लेके चल रहे हो
तोह जिंदा हो तुम!

हवा के झोंकों के जैसे आज़ाद रहना सीखो
तुम एक दरिया के जैसे, लहरों में बहना सीखो
हर एक लम्हे से तुम मिलो खोले अपनी बाहें
हर एक पल एक नया समा देखे यह निगाहें

जो अपनी आँखों में हैरानियाँ लेके चल रहे हो
तोह जिंदा हो तुम!
दिलों में तुम अपनी बेताबियाँ लेके चल रहे हो
तोह जिंदा हो तुम”

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Posted on जुलै 26, 2011, in हलकं-फुलकं and tagged . Bookmark the permalink. 5 प्रतिक्रिया .

  1. Nice synopsis ! I like specially the line चित्रपटातला सर्वात बलवान मुद्दा आहे… reminded me the movie Balwan by The great Sunil Shetty !

    • 😀 😀 😀
      खरं तर मी मुव्ही चा सारांश लिहायचा प्रयत्न केलाच नाही. मला तर फक्त शायरी पोस्ट करायची होती. तो पहिला परिच्छेद म्हणजे उगा माझी बडबड आहे.
      बाकी ‘बलवान’ मला पण आठवतोय चांगलाच आता. 😛

  2. ,And now you have reminded me सारांश ! 😛

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